bajrang baan – बजरंग बाण का पाठ

जय श्री हनुमान, श्री हनुमान का नाम सच्चे भक्तिभाव से लेते ही मानव की पीड़ा का अंत हो जाता है। अगर मानव को किस भी प्रकार का कष्ट है या फिर कोई भी परेशानी है तो उसे bajrang baan (बजरंग बान ) का पाठ नित्य करना चाहिए। सभी भक्तों को हनुमानजी की आराधना करनी चाहिए और हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए क्योंकि संकट मोचन सभी के कष्टों को दूर करते हैं।

1- बजरंग बाण का पाठ कब करना चाहिए?

भक्तो को बजरंग बान का पाठ नित्य करना चाहिए या सुबह या श्याम पाठ करना चाहिए। मन मे प्रभु श्री राम का स्मरण करते हुए पाठ करने से पाठ का फल अवश्य मिलता है।

2- बजरंग बाण की सिद्धि कैसे करें?

केवल “राम” नाम से ही बजरंग बान की सिद्धि हो सकती है। आपको प्रभु श्री राम का नाम स्मरण करते हुये पाठ का आरंभ करना है ओर दिनभर आपको आपका मन शुद्ध रखना है मन से सारे विकार आपको निकाल देना है इस लिए आपको निरंतर “राम नाम ” जपना है।

3- क्या महिलाएं बजरंग बाण का पाठ कर सकती है?

हा जरूर क्यूकी महिला भी एक जीव है जिसे परमात्मा ने निर्माण किया है। प्रभु कभी भी अपने भक्तो मे अंतर नहीं करते भले ही वो पुरुष हो या महिला ये फिर भले वो किसी भी धर्म का हो। महिलाए बजरंग बलि की भक्ति कर सकती ओर हनुमान चालीसा भी पढ़ सकती है।

4- बजरंग बाण पढ़ने से क्या होता है?

बजरंग बान( bajrang baan ) हनुमान जी का एक शक्तिशाली मंत्र है जिस के नियमित पाठ आपके जीवन के सारे कष्ट चाहे वो किसी भी प्रकार के क्यू न हो दूर हो जाते है ओर आपके मन मे जो भी अधूरी इस्छा है वो भी बजरंग बली के कृपा से पूर्ण हो जाती है।

5- बजरंग बाण क्यों नहीं पढ़ना चाहिए?

बजरंग बान एक शक्तिशाली मंत्र है इसका पाठ आपको अवश्य करना चाहिए इस पाठ से आपको कोई नुकसान नहीं होगा उल्टा आपको कल्याण होगा।

अगर आपके मन मे विकार है ओर आप दुसरो का द्वेष करते हो या दुसरो का भला आपसे देखा नहीं जाता तो आपको बजरंग पाठ आरंभ करने से पहले “राम नाम ” का निरंतर जप करके अपने मन से दोष को हटाना होगा तब जाके आप बजरंग बान का पाठ करके बजरंग बली की कृपा प्राप्त कर सकते हो।

आपको हमेशा दुसरोका भला सोचना है क्यूकी भगवान हमेशा मानव का भला ही सोचते है इस प्रकार आपका मन भगवान के मन से मिल जाएगा।


“श्री गणेशाय नमः “

“जय श्री राम,जय श्री हनुमान “

दोहा

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।

तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।

चौपाई

जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।

जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।

जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा।।

बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा।।

अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।।

लाह समान लंक जरि गई। जै जै धुनि सुर पुर में भई।।

अब विलंब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी।।

जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होई दुख करहु निपाता।।

जै गिरधर जै जै सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर।।

ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले। वैरहिं मारू बज्र सम कीलै।।

गदा बज्र तै बैरिहीं मारौ। महाराज निज दास उबारों।।

सुनि हंकार हुंकार दै धावो। बज्र गदा हनि विलम्ब न लावो।।

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा।।

सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दुत धरू मारू धाई कै।।

जै हनुमन्त अनन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत है दास तुम्हारा।।

वन उपवन जल-थल गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।

पाँय परौं कर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं।।

जै अंजनी कुमार बलवन्ता। शंकर स्वयं वीर हनुमंता।।

बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर शालक।।

भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मर।।

इन्हहिं मारू, तोंहि शमथ रामकी। राखु नाथ मर्याद नाम की।।

जनक सुता पति दास कहाओ। ताकी शपथ विलम्ब न लाओ।।

जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत सुसह दुःख नाशा।।

उठु-उठु चल तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई।।

ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।

ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।

अपने जन को कस न उबारौ। सुमिरत होत आनन्द हमारौ।।

ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी।।

ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।

हे बजरंग, बाण सम धावौ। मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ।।

हे कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।।

जन की लाज जात ऐहि बारा। धावहु हे कपि पवन कुमारा।।

जयति जयति जै जै हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना।।

जयति जयति जै जै कपिराई। जयति जयति जै जै सुखदाई।।

जयति जयति जै राम पियारे। जयति जयति जै सिया दुलारे।।

जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।।

ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहीं लवलेषा।।

राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना।।

विधि शारदा सहित दिनराती। गावत कपि के गुन बहु भाँति।।

तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखउं विधि नाना।।

यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई।।

सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे।।

एहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करै लहै सुख ढेरी।।

याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बनवाना।।

मेटत आए दुःख क्षण माहिं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं।।

पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।

डीठ, मूठ, टोनादिक नासै। परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे।।

भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई।।

प्रण कर पाठ करें मन लाई। अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई।।

आवृत ग्यारह प्रतिदिन जापै। ताकी छाँह काल नहिं चापै।।

दै गूगुल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेषा।।

यह बजरंग बाण जेहि मारे। ताहि कहौ फिर कौन उबारे।।

शत्रु समूह मिटै सब आपै। देखत ताहि सुरासुर काँपै।।

तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहै सदा कपिराज सहाई।।

दोहा

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान।।

तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।


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